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डीएमएफ निर्माण कार्य में इंजीनियर के मूल्यांकन पर गंभीर सवाल,आरटीआई से मिले दस्तावेजों और जमीनी हकीकत में अंतर का दावा
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डीएमएफ निर्माण कार्य में इंजीनियर के मूल्यांकन पर गंभीर सवाल,आरटीआई से मिले दस्तावेजों और जमीनी हकीकत में अंतर का दावा

  • 📢 आरटीआई से मिले दस्तावेजों ने खोली तकनीकी सत्यापन की परतें
  • 📢 इंजीनियर के मूल्यांकन एवं सत्यापन पर उठे गंभीर सवाल
  • 📢 जनदर्शन में शिकायत, फिर भी कार्रवाई का इंतजार
  • 📢 सत्ता पक्ष के पदाधिकारी ने उठाई आवाज, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

  • 📢 प्रशासनिक अव्यवस्था या जांच में लापरवाही?
  • 📢  आम जनता के अधिकारों और पारदर्शिता पर सवाल
  • 📢  अब निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग

मुंगेली/पथरिया- ग्राम पेंड्री स्थित डी.ए.वी. स्कूल के जीर्णोद्धार कार्य को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध तकनीकी प्राक्कलन के अनुसार विद्यालय भवन के जीर्णोद्धार के लिए लगभग 10 लाख रुपये की लागत से विभिन्न मरम्मत कार्य प्रस्तावित किए गए थे। दस्तावेज़ों में तकनीकी परीक्षण, स्थल निरीक्षण और संबंधित अधिकारियों द्वारा स्वीकृति का उल्लेख भी दर्ज है।

हालांकि, वर्तमान स्थिति इन दावों पर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। हालिया बारिश के दौरान विद्यालय भवन की छत से कई स्थानों पर पानी का रिसाव (सीपेज) देखा गया। कक्षाओं की छत से पानी टपकने और दीवारों में नमी दिखाई देने से यह सवाल उठ रहा है कि क्या जीर्णोद्धार का कार्य स्वीकृत प्राक्कलन और निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप किया गया था।

🫵यदि मरम्मत कार्य पूरी गुणवत्ता के साथ किया गया था, तो इतनी कम अवधि में भवन की यह स्थिति कैसे उत्पन्न हो गई? क्या प्राक्कलन में शामिल सभी कार्य वास्तव में स्थल पर किए गए? 

🫵क्या कार्य पूर्ण होने के बाद गुणवत्ता परीक्षण एवं भौतिक सत्यापन नियमानुसार किया गया? 

🫵इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच आवश्यक प्रतीत होती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी विद्यालय की छत से पानी टपकना चिंताजनक है। बरसात के मौसम में यह स्थिति विद्यार्थियों और शिक्षकों की सुरक्षा के साथ-साथ शैक्षणिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती है।

अब आवश्यकता है कि संबंधित विभाग पूरे मामले की तकनीकी जांच कराए, स्वीकृत प्राक्कलन, माप पुस्तिका (Measurement Book), भुगतान अभिलेख एवं कार्य की गुणवत्ता का भौतिक सत्यापन करे। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता, लापरवाही या मानकों की अनदेखी सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों एवं कार्यदायी एजेंसी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

🫵आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार संबंधित इंजीनियर द्वारा निर्माण कार्य का मूल्यांकन एवं सत्यापन कर उसे पूर्ण दर्शाया गया है। वहीं शिकायतकर्ताओं का कहना है कि स्थल की वास्तविक स्थिति अभिलेखों से मेल नहीं खाती। यदि यह दावा सही है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि बिना कार्य पूर्ण हुए मूल्यांकन और सत्यापन किस आधार पर किया गया। तकनीकी अधिकारी का मूल्यांकन ही शासकीय भुगतान का आधार बनता है, ऐसे में उसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

लिपापोती कर जर्जरता छिपाया गया 

लाखों की मरम्मत के बाद भी टपक रही छत,गुणवत्ता पर गंभीर सवाल

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस भवन की मरम्मत पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया, उसी भवन की छत से बारिश के दौरान कई स्थानों पर पानी का रिसाव (सीपेज) हो रहा है। यदि मरम्मत कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों एवं स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप किया गया था, तो फिर बरसात में छत से पानी टपकने की स्थिति क्यों बनी? यह सवाल स्थानीय लोगों के साथ-साथ शिकायतकर्ताओं द्वारा भी उठाया जा रहा है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि मरम्मत के तुरंत बाद ही भवन में सीपेज जैसी समस्या सामने आ रही है, तो कार्य की गुणवत्ता, निर्माण सामग्री तथा संबंधित इंजीनियर द्वारा किए गए मूल्यांकन एवं सत्यापन की निष्पक्षता की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। उनका आरोप है कि वास्तविक गुणवत्ता का समुचित परीक्षण किए बिना ही कार्य को संतोषजनक अथवा पूर्ण मान लिया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी शासकीय निर्माण अथवा मरम्मत कार्य में तकनीकी अधिकारी का मूल्यांकन एवं सत्यापन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। यदि गुणवत्ता संबंधी कमियां होने के बावजूद कार्य को पूर्ण अथवा संतोषजनक प्रमाणित किया गया हो, तो यह केवल निर्माण एजेंसी ही नहीं, बल्कि तकनीकी निरीक्षण व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

ऐसे में स्थानीय लोगों ने पूरे प्रकरण की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराकर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। 

प्रशासनिक अव्यवस्था पर उठे सवाल

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न प्रशासनिक जवाबदेही का है। शिकायत के बावजूद यदि संबंधित विभाग वस्तुस्थिति का निष्पक्ष परीक्षण करने के बजाय केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित रहता है, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। 

सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान की प्रक्रिया का उद्देश्य सार्वजनिक धन का सही उपयोग सुनिश्चित करना है। यदि शिकायतों का समयबद्ध और निष्पक्ष निराकरण नहीं होता, तो शासन व्यवस्था में जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है।

राजनीतिक प्रभाव की चर्चा भी तेज

इस मामले को लेकर ग्राम पंचायत के पंच एवं भाजपा जिला मीडिया प्रभारी लगातार आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने जिला कलेक्टर के जनदर्शन में शिकायत प्रस्तुत कर निष्पक्ष जांच की मांग भी की है। इसके बावजूद अब तक स्पष्ट और प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आने से स्थानीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब सत्ता पक्ष से जुड़े पदाधिकारी भी सार्वजनिक रूप से कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और फिर भी प्रकरण लंबित है, तो इससे प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, इस संबंध में किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रभाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

आम जनता के अधिकारों का सवाल

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यदि किसी सार्वजनिक निर्माण कार्य के संबंध में नागरिकों को जानकारी प्राप्त करने के बाद भी शिकायतों का निष्पक्ष परीक्षण नहीं होता, तो यह सुशासन की भावना के विपरीत माना जा सकता है। सार्वजनिक धन से होने वाले प्रत्येक निर्माण कार्य पर जनता का अधिकार है कि वह उसकी गुणवत्ता, लागत, भुगतान और वास्तविक प्रगति के बारे में जानकारी प्राप्त करे तथा आवश्यकता पड़ने पर जांच की मांग करे।

इंजीनियर की भूमिका जांच के केंद्र में

पूरा विवाद संबंधित इंजीनियर द्वारा किए गए मूल्यांकन एवं सत्यापन के इर्द-गिर्द केंद्रित है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि जांच में यह स्थापित होता है कि वास्तविक स्थिति और मूल्यांकन में अंतर है, तो संबंधित तकनीकी अधिकारी की जवाबदेही तय होना आवश्यक है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि ऐसे मामलों में स्वतंत्र तकनीकी दल से पुनर्मूल्यांकन, माप पुस्तिका (एमबी) का भौतिक सत्यापन तथा भुगतान अभिलेखों की जांच कराई जानी चाहिए, ताकि तथ्य स्पष्ट हो सकें।

अब स्थानीय लोगों की मांग है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराए, वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करे और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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