🫵 शिकायत के बाद भी जांच नहीं, क्या प्रशासनिक निष्क्रियता दे रही है लिपापोती का मौका?
🫵 शिकायत के बाद भी निष्क्रिय प्रशासन, क्या साक्ष्यों से पहले बदल दी जा रही है हकीकत?
🫵 डीएमएफ निर्माण विवाद : शिकायत के बाद कार्रवाई नहीं, प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल
मुंगेली/पथरिया। ग्राम पंचायत जरेली में डीएमएफ मद से कराए गए जीर्णोद्धार कार्य को लेकर शिकायत दर्ज होने के बाद भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि शिकायत के बाद तत्काल स्वतंत्र जांच कराने के बजाय संबंधित कार्यस्थल पर मरम्मत, लिपाई-पुताई और अन्य सुधारात्मक गतिविधियां शुरू हो गईं।
यदि यह सही है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पहले साक्ष्य सुरक्षित किए गए या पहले स्थल की स्थिति बदलने का अवसर दिया गया? किसी भी निर्माण संबंधी शिकायत में सामान्य अपेक्षा यही होती है कि संबंधित अधिकारी तत्काल स्थल का निरीक्षण करें, आवश्यक होने पर कार्यस्थल को यथास्थिति में सुरक्षित रखें, तकनीकी जांच कराएं और उसके बाद ही आगे की कार्रवाई करें। यदि जांच से पहले ही निर्माण की स्थिति बदल जाती है, तो वास्तविक तथ्यों का निष्पक्ष परीक्षण प्रभावित हो सकता है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर समय पर कार्रवाई नहीं होने से संबंधित एजेंसी को कमियों को छिपाने का अवसर मिल रहा है। उनका कहना है कि यदि शिकायत मिलते ही तकनीकी दल गठित कर भौतिक सत्यापन, माप पुस्तिका (एमबी), भुगतान अभिलेख तथा स्वीकृत प्राक्कलन का मिलान किया जाता, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती थी।
इस पूरे मामले में अब कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने हैं—
- शिकायत प्राप्त होने के बाद तत्काल जांच क्यों शुरू नहीं की गई?
- क्या अधिकारियों ने प्रारंभिक निरीक्षण कर साक्ष्य सुरक्षित किए?
- यदि मरम्मत कार्य बाद में कराया जा रहा है, तो उसकी अनुमति किसके निर्देश पर दी गई?
- क्या जांच पूरी होने से पहले कार्यस्थल की स्थिति बदलना उचित प्रशासनिक प्रक्रिया है?
- शिकायत लंबित रहने के दौरान जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक क्या कार्रवाई की?
प्रशासनिक जवाबदेही का मूल सिद्धांत यह है कि सार्वजनिक धन से कराए गए कार्यों में पारदर्शिता और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए। यदि शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई नहीं होती और इस दौरान कार्यस्थल की स्थिति बदल जाती है, तो निष्पक्ष जांच की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
उक्त मामले को लेकर पत्रकार प्रदीप मानिकपुरी एवं छत्तीसगढ़ मानवाधिकार जनजागरण फाउंडेशन के बिलासपुर जिला उपाध्यक्ष द्वारा आयुक्त, कलेक्टर सहित संबंधित उच्च अधिकारियों को शिकायत एवं साक्ष्यों के साथ जांच की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया गया है। शिकायत में पूरे प्रकरण की स्वतंत्र तकनीकी जांच, अभिलेखों के सत्यापन तथा दोषी पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित एजेंसी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की गई है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस शिकायत पर कितनी गंभीरता से संज्ञान लेता है और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध निष्पक्ष एवं समयबद्ध कार्रवाई कब तक सुनिश्चित की जाती है। इस मामले पर स्थानीय लोगों की भी नजर बनी हुई है।
अब स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं की मांग है कि जिला प्रशासन स्वतंत्र तकनीकी दल गठित कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए, जांच पूरी होने तक उपलब्ध अभिलेखों और स्थल की स्थिति का वैज्ञानिक परीक्षण सुनिश्चित करे तथा यदि किसी स्तर पर लापरवाही, अनियमितता या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई की जाए।
(यदि संबंधित विभाग या अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होता है,तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)


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