रायपुर, 14 मार्च 2026/कोशलभूमि न्यूज
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं के लगातार विस्तार और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से गंभीर बीमारियों के उपचार में भी सफलता मिल रही है। इसका ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर में देखने को मिला, जहां श्वसन रोग विभाग के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने एक जटिल क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित मरीज का सफल उपचार कर उसे नई जिंदगी दी है। आधुनिक जांच पद्धतियों, उन्नत मशीनों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम के संयुक्त प्रयास से यह संभव हो सका।
अस्पताल प्रशासन ने इसे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया है। डॉक्टरों के अनुसार समय पर सही जांच और उचित उपचार से दवा-प्रतिरोधी टीबी जैसी जटिल बीमारी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
पांच महीने से चल रहा था इलाज, फिर भी नहीं मिल रहा था आराम
जानकारी के अनुसार रतनपुर क्षेत्र की 19 वर्षीय युवती मई 2025 में सिम्स बिलासपुर के श्वसन रोग विभाग के बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में पहुंची थी। मरीज लंबे समय से लगातार खांसी, जुकाम, शाम के समय बुखार, भूख में कमी, तेजी से वजन घटने और सामान्य कमजोरी की समस्या से परेशान थी।
परिजनों ने बताया कि युवती लगभग पांच महीने से दवा-संवेदनशील क्षय रोग यानी डीएस-टीबी की दवा ले रही थी, लेकिन इसके बावजूद उसकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा था। लगातार दवा लेने के बाद भी जब बीमारी के लक्षण बने रहे तो परिजन उसे बेहतर इलाज के लिए सिम्स बिलासपुर लेकर पहुंचे।
विशेषज्ञ चिकित्सकों ने किया विस्तृत परीक्षण
सिम्स के श्वसन रोग विभाग के प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. प्रतीक कुमार, सहायक प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार डनसेना तथा वरिष्ठ रेजिडेंट डॉ. आकांक्षा गुप्ता ने मरीज की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए उसकी विस्तृत जांच शुरू की।
सबसे पहले मरीज का छाती का एक्स-रे किया गया। एक्स-रे रिपोर्ट में दोनों फेफड़ों में फाइब्रो-कैविटेटरी घाव पाए गए, जो गंभीर संक्रमण का संकेत देते हैं। हालांकि प्रारंभिक बलगम जांच में टीबी की पुष्टि नहीं हो पाई और रिपोर्ट निगेटिव आई।
लेकिन मरीज के लगातार बने हुए लक्षणों को देखते हुए डॉक्टरों को संदेह हुआ कि यह सामान्य टीबी का मामला नहीं है। इसके बाद डॉक्टरों ने मरीज की ब्रोंकोस्कोपी जांच कराने की सलाह दी।
ब्रोंकोस्कोपी जांच से सामने आया असली कारण
ब्रोंकोस्कोपी एक आधुनिक जांच प्रक्रिया है जिसमें एक पतली दूरबीननुमा नली को सांस की नलियों के अंदर डाला जाता है। इस प्रक्रिया के जरिए फेफड़ों के अंदर की स्थिति को सीधे देखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर नमूना भी लिया जा सकता है।
इस जांच के दौरान डॉक्टरों ने ब्रोंको-एल्वियोलर लवाज (BAL) का नमूना लिया। यह नमूना आधुनिक लैब जांच के लिए भेजा गया।
इसके बाद किए गए कार्ट्रिज आधारित न्यूक्लिक एसिड प्रवर्धन परीक्षण (CBNAAT) में यह पुष्टि हुई कि मरीज को रिफैम्पिसिन प्रतिरोधी टीबी है। इसका मतलब था कि मरीज की बीमारी सामान्य टीबी नहीं बल्कि दवा-प्रतिरोधी टीबी है।
लाइन प्रोब एसे जांच में मिली गंभीर जानकारी
इसके बाद मरीज की लाइन प्रोब एसे (LPA) जांच भी कराई गई। इस जांच में पता चला कि मरीज के शरीर में टीबी के बैक्टीरिया रिफैम्पिसिन और आइसोनियाजिड दोनों दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं।
चिकित्सकीय भाषा में इसे मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट टीबी (MDR-TB) कहा जाता है। यह टीबी का एक जटिल और खतरनाक रूप होता है जिसमें सामान्य दवाएं प्रभावी नहीं होतीं।
इस स्थिति में मरीज के इलाज के लिए विशेष दवाओं और लंबी अवधि के उपचार की आवश्यकता होती है।
नई दवाओं से शुरू किया गया उपचार
जांच रिपोर्ट आने के बाद सिम्स के डॉक्टरों ने दवा-प्रतिरोधी क्षय रोग के कार्यक्रमगत प्रबंधन (PMDT) की गाइडलाइन के अनुसार मरीज का उपचार शुरू किया।
मरीज को पूर्णतः मौखिक दीर्घकालीन बहु-दवा प्रतिरोधी टीबी उपचार पद्धति के तहत नई और प्रभावी दवाएं दी गईं। यह उपचार सामान्य टीबी की तुलना में अधिक समय तक चलता है और इसमें कई प्रकार की दवाओं का संयोजन उपयोग किया जाता है।
डॉक्टरों की निगरानी में मरीज का उपचार शुरू हुआ और उसकी स्थिति पर लगातार नजर रखी जाने लगी।
इलाज के दौरान सामने आई नई जटिलता
उपचार के दौरान 31 जुलाई 2025 को मरीज को अचानक सांस लेने में गंभीर समस्या होने लगी। उसे सांस फूलने और ऑक्सीजन की कमी की शिकायत के साथ दोबारा अस्पताल लाया गया।
जांच करने पर डॉक्टरों ने पाया कि मरीज के दोनों फेफड़ों में न्यूमोथोरैक्स की समस्या हो गई है। न्यूमोथोरैक्स ऐसी स्थिति होती है जिसमें फेफड़ों के आसपास हवा भर जाती है और फेफड़े सही तरीके से काम नहीं कर पाते।
यह स्थिति मरीज के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है।
डॉक्टरों ने तुरंत किया जीवनरक्षक उपचार
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सिम्स के डॉक्टरों ने तुरंत उपचार शुरू किया। मरीज के दाहिने फेफड़े में इंटरकॉस्टल ड्रेनेज ट्यूब (ICD) लगाई गई ताकि फेफड़ों में भरी हवा को बाहर निकाला जा सके।
वहीं बाएं फेफड़े में हुई समस्या का उपचार संरक्षणात्मक तरीके से किया गया।
कुछ दिनों के उपचार के बाद मरीज की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा और उसकी सांस लेने की समस्या कम हो गई।
उपचार के बाद मरीज की हालत में लगातार सुधार
डॉक्टरों की निगरानी और नियमित उपचार के बाद मरीज की स्थिति में लगातार सुधार देखा गया। इसके बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
वर्तमान समय में मरीज बहु-दवा प्रतिरोधी टीबी के पूर्णतः मौखिक उपचार पर है और नियमित रूप से दवाएं ले रही है। डॉक्टरों के अनुसार मरीज की सेहत में अब लगातार सुधार हो रहा है।
सिम्स में उपलब्ध हैं आधुनिक जांच सुविधाएं
सिम्स बिलासपुर के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इस सफलता पर कहा कि संस्थान में टीबी सहित जटिल श्वसन रोगों के उपचार के लिए आधुनिक जांच सुविधाएं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम उपलब्ध है।
उन्होंने बताया कि समय पर सही जांच और उपचार से गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी स्वस्थ किया जा सकता है। सिम्स में आधुनिक मशीनों की मदद से जटिल मामलों की भी सटीक पहचान संभव हो रही है।
दवाओं का पूरा कोर्स लेना बेहद जरूरी
सिम्स के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने कहा कि टीबी के मरीजों के लिए दवाओं का पूरा कोर्स लेना बेहद जरूरी है।
उन्होंने बताया कि कई बार मरीज शुरुआती सुधार होने पर दवा लेना बंद कर देते हैं, जिससे बीमारी फिर से उभर सकती है और दवा-प्रतिरोधी टीबी का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. सिंह ने लोगों से अपील की कि यदि टीबी का उपचार चल रहा हो और लक्षण बने रहें तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
आधुनिक तकनीक से संभव हुआ समय पर निदान
श्वसन रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रतीक कुमार ने बताया कि आधुनिक जांच तकनीकों की सहायता से दवा-प्रतिरोधी टीबी का समय पर पता लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि पहले ऐसे मामलों का पता लगाने में काफी समय लग जाता था, लेकिन अब नई जांच तकनीकों से जल्दी और सटीक जानकारी मिल जाती है। इससे मरीज को समय पर सही उपचार मिल पाता है और गंभीर जटिलताओं से बचाया जा सकता है।
स्वास्थ्य मंत्री की पहल से मिली आधुनिक मशीनें
इस अवसर पर बताया गया कि छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की पहल से राज्य के सरकारी अस्पतालों में आधुनिक मशीनें और उन्नत जांच सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
सरकार का उद्देश्य है कि प्रदेश के लोगों को सरकारी अस्पतालों में ही बेहतर और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें।
इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप सिम्स बिलासपुर में भी अत्याधुनिक जांच उपकरण उपलब्ध हो सके हैं, जिनकी मदद से जटिल रोगों का भी समय पर सही निदान और उपचार संभव हो पा रहा है।
टीबी के प्रति जागरूकता जरूरी
चिकित्सकों का कहना है कि टीबी आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, लेकिन समय पर जांच और सही उपचार से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति को लगातार दो सप्ताह से अधिक खांसी, बुखार, वजन कम होना, भूख न लगना या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
सरकार द्वारा टीबी के मरीजों को मुफ्त दवाएं और इलाज की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है।
स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती का उदाहरण
सिम्स बिलासपुर में जटिल टीबी मरीज के सफल उपचार की यह घटना राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं के लगातार सुदृढ़ होने का प्रमाण है।
आधुनिक मशीनों, विशेषज्ञ चिकित्सकों और बेहतर उपचार प्रणाली की मदद से अब सरकारी अस्पतालों में भी गंभीर और जटिल बीमारियों का सफल इलाज संभव हो रहा है।
इस सफलता से यह भी संदेश मिलता है कि समय पर सही जांच और उपचार से गंभीर से गंभीर बीमारी पर भी काबू पाया जा सकता है।
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