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आदिवासी “फेक एनकाउंटर” मामले में हाई कोर्ट सख्त, 45 दिन में मुआवजा देने का आदेश — एडवोकेट सी.एस. चौहान


बिलासपुर 18 मार्च 2026

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के कासाबेल थाना क्षेत्र में वर्ष 1992 में हुए बहुचर्चित डेंगूरजोर आदिवासी हत्याकांड मामले में एक बार फिर न्याय की किरण दिखाई दी है। इस गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में माननीय हाई कोर्ट ने मृतक के परिजनों को मुआवजा देने का आदेश जारी किया है।

मामले की पैरवी कर रहे छत्तीसगढ़ मानवाधिकार JJF के प्रदेश अध्यक्ष एवं अधिवक्ता सी.एस. चौहान के अनुसार, न्यायालय ने कलेक्टर जशपुर को निर्देशित किया है कि 45 दिनों के भीतर पीड़ित परिवार को क्षतिपूर्ति राशि प्रदान की जाए।

क्या था पूरा मामला?

वर्ष 1992 में कासाबेल थाना प्रभारी द्वारा लगभग 20 से 25 आदिवासी एवं समाजसेवकों को नक्सलवादी बताकर गिरफ्तार किया गया। सभी को थाने लाकर थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया गया, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

अगले दिन जब इन आदिवासियों को न्यायालय में पेश करने के लिए बस से ले जाया जा रहा था, तब रास्ते में उनके परिजन—माता-पिता, पत्नी और बच्चे—बस को रोककर अपने परिजनों से मिलने की गुहार लगाने लगे।

लेकिन आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनकी एक न सुनी और लाठी, बेल्ट, लोहे की रॉड तथा हाथ-मुक्कों से बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी। महिलाओं के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए।

रामनाथ नागवंशी की हत्या

इसी दौरान आदिवासी नेता रामनाथ नागवंशी (सूर्यवंशी) ने पुलिस से सवाल किया कि उनके परिजनों को क्यों मारा जा रहा है और यदि मारना है तो उन्हें मारा जाए।

आरोप है कि इस पर थाना प्रभारी एच.आर. अहिरवार ने अपने सर्विस रिवॉल्वर से सीधे उनके सीने पर गोली चला दी, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

शव को जलाकर सबूत मिटाने का आरोप

घटना के बाद पुलिसकर्मियों ने मृतक का शव परिवार को सौंपने के बजाय अपने कब्जे में लेकर जला दिया।

यह भी उल्लेखनीय है कि मृतक ईसाई धर्म से संबंधित थे, जिनमें दफनाने की परंपरा होती है, लेकिन परिवार को अंतिम संस्कार तक का अवसर नहीं दिया गया।

न्याय की लंबी लड़ाई

इस घटना के बाद मृतक के छोटे भाई रीमनाथ सूर्यवंशी ने जिला न्यायालय जशपुर में भारतीय दंड संहिता की धारा 200 और 202 के तहत परिवाद दायर किया।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि आदिवासियों के साथ गंभीर अत्याचार हुआ है। इसके बाद सेशन केस क्रमांक 211/1997 दर्ज कर धारा 302, 323 सहित अन्य धाराओं में मामला चलाया गया।

ट्रायल के दौरान न्यायालय ने थाना प्रभारी पर लगे धारा 302 के आरोप को बदलकर धारा 304 के तहत 5 वर्ष के सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। वहीं अन्य 5 पुलिसकर्मियों को धारा 323 के तहत दंडित किया गया।

33 वर्षों तक संघर्ष

घटना के बाद मृतक का परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट गया और उन्हें जीविका के लिए दर-दर भटकना पड़ा। वर्ष 1992 से लेकर 2025 तक परिवार न्याय और आर्थिक सहायता के लिए संघर्ष करता रहा, लेकिन कोई ठोस मदद नहीं मिली।

हाई कोर्ट में याचिका और बड़ा फैसला

बाद में पीड़ित परिवार की मुलाकात अधिवक्ता सी.एस. चौहान से हुई। उन्होंने मामले को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर जशपुर, पुलिस अधीक्षक, पुलिस मुख्यालय रायपुर सहित विभिन्न विभागों को पत्र लिखकर 1 करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की।

जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब उन्होंने हाई कोर्ट बिलासपुर में रिट याचिका दायर की।

मामले की सुनवाई के बाद माननीय न्यायालय ने इसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए कलेक्टर को 45 दिनों के भीतर पीड़ित परिवार को क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश दिया।

डेंगूरजोर हत्याकांड आज भी आदिवासी समाज के जख्मों को ताजा करता है। हालांकि देर से ही सही, लेकिन हाई कोर्ट के इस आदेश ने पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद जरूर दी है।


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