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छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के बाद बड़ा संकट: उठाव अटका, खरीदी प्रभारी बने बलि का बकरा!

 छत्तीसगढ़ धान खरीदी संकट: उठाव में देरी,खरीदी प्रभारियों पर बढ़ा दबाव,विधानसभा में गूंजा मुद्दा


रिपोर्ट -प्रदीप मानिकपुरी 

रायपुर छत्तीसगढ़ में इस वर्ष धान खरीदी का रिकॉर्ड बनना सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया, लेकिन खरीदी खत्म होते ही अब पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। राज्यभर के खरीदी केंद्रों में धान का भारी स्टॉक जमा हो गया है, जबकि उठाव की प्रक्रिया अपेक्षित गति से नहीं चल पा रही है। इस स्थिति ने न केवल प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा किया है, बल्कि जमीनी स्तर पर काम कर रहे खरीदी प्रभारियों को भी कठिन परिस्थिति में डाल दिया है।

इस वर्ष राज्य में करोड़ों क्विंटल धान की रिकॉर्ड खरीदी

जिलेवार स्थिति देखें तो बलौदाबाजार, जांजगीर-चांपा, महासमुंद, धमतरी, बेमेतरा और कबीरधाम जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर धान खरीदी की गई है। लेकिन इन जिलों के कई खरीदी केंद्रों में अब धान का अंबार लगा हुआ है। गोदामों की क्षमता सीमित होने के कारण बड़ी मात्रा में धान खुले में रखा गया है, जिससे खराब होने का खतरा लगातार बना हुआ है। तिरपाल से ढककर रखे गए धान पर मौसम का असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

उठाव में देरी: सिस्टम कहां अटका?

धान उठाव में आ रही देरी के पीछे कई कारण सामने आ रहे हैं। मिलर्स द्वारा समय पर उठाव नहीं किया जाना, कस्टम मिलिंग की धीमी प्रक्रिया, ट्रांसपोर्ट की कमी और विभागों के बीच समन्वय का अभाव इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। नतीजतन, खरीदी केंद्रों में स्टॉक लगातार बढ़ता जा रहा है और स्थिति नियंत्रण से बाहर होती नजर आ रही है।

धान उठाव की सुस्ती अब राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है।

यह मुद्दा अब राजनीतिक रूप भी ले चुका है। विपक्ष ने विधानसभा में इसे जोरदार तरीके से उठाते हुए सरकार पर प्रबंधन में विफलता का आरोप लगाया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने केवल धान खरीदी पर ध्यान दिया, लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया यानी उठाव और भंडारण के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की गई। हालांकि सरकार का दावा है कि स्थिति नियंत्रण में है और उठाव की प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन जमीनी हालात इन दावों से अलग नजर आ रहे हैं।

सिस्टम का असली दबाव अब खरीदी प्रभारियों पर

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा दबाव जिस वर्ग पर दिखाई दे रहा है, वह है खरीदी प्रभारी। ये वे अधिकारी और कर्मचारी हैं जो जमीनी स्तर पर खरीदी केंद्रों का संचालन करते हैं। वर्तमान स्थिति में उनके सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर उन्हें बढ़ते स्टॉक को संभालना है, वहीं दूसरी ओर ऊपर से लगातार रिपोर्टिंग और जवाबदेही का दबाव बना हुआ है। खरीदी के समय जहां अधिक से अधिक लक्ष्य पूरा करने पर जोर दिया गया, वहीं अब उठाव में देरी के कारण जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू होती दिख रही है।

रिकवरी का डर: सबसे बड़ा दबाव

सूत्रों के अनुसार खरीदी प्रभारियों के बीच सबसे बड़ी चिंता रिकवरी को लेकर है। यदि किसी केंद्र में स्टॉक में कमी पाई जाती है, रिकॉर्ड और वास्तविक मात्रा में अंतर मिलता है या धान खराब होता है, तो उसकी जिम्मेदारी सीधे प्रभारी पर तय की जा सकती है। यही कारण है कि कई जगहों पर यह डर बना हुआ है कि किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में आर्थिक वसूली, विभागीय जांच या अन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

प्रतिकात्मक फोटो 

जिम्मेदारी सीधे प्रभारी पर

स्थिति को और जटिल बनाता है वह असंतुलन, जिसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया और जवाबदेही का वितरण अलग-अलग स्तरों पर होता है। नीतिगत फैसले उच्च स्तर पर लिए जाते हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों की जिम्मेदारी अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों पर आ जाती है। वर्तमान हालात में खरीदी प्रभारियों के बीच यह भावना स्पष्ट रूप से देखी जा रही है कि वे सिस्टम के बीच में फंसे हुए हैं, जहां नियंत्रण सीमित है लेकिन जिम्मेदारी पूरी है।         “न ऊपर पूरी तरह नियंत्रण, न नीचे पूरी छूट—लेकिन जिम्मेदारी पूरी।

जवाबदेही का संतुलन सही तरीके से तय नहीं  किया गया

प्रशासन पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि इस पूरे मामले में स्पष्ट जवाबदेही तय करने के बजाय विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। इससे समस्या का समाधान निकलने के बजाय और अधिक भ्रम की स्थिति बन रही है। कई जगहों पर अधिकारी “डीओ -काट” कर अपना पल्ला झड़ लिए है, जहां जिम्मेदारी को आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ रहा।

यदि धान उठाव की प्रक्रिया में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। लंबे समय तक खुले में रखे धान के खराब होने का खतरा बना हुआ है, जिससे सरकारी नुकसान के साथ-साथ जवाबदेही का दबाव और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग होगा, जो पहले से ही दबाव में है—खरीदी प्रभारी।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल खरीदी का रिकॉर्ड बनाना ही पर्याप्त नहीं है, या उसके बाद की प्रक्रिया के लिए भी समान रूप से मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। साथ ही यह भी जरूरी है कि जवाबदेही तय करते समय संतुलन बनाया जाए, ताकि जमीनी स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

अंततः, छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के बाद की यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली की परीक्षा बन गई है। अब देखना यह होगा कि सरकार और प्रशासन इस संकट से कैसे निपटते हैं और क्या खरीदी प्रभारियों को इस दबाव से राहत मिल पाती है या नहीं।



भूपेश सरकार से तुलना: क्यों याद आ रहे पुराने दिन?

छत्तीसगढ़ में धान खरीदी और उठाव को लेकर बने वर्तमान संकट के बीच अब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की तुलना भी तेज़ी से सामने आ रही है। सहकारिता विभाग से जुड़े कई कर्मचारियों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले खरीदी प्रभारियों का कहना है कि उस दौर में खरीदी और उठाव की प्रक्रिया अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित और समन्वित थी। भुगतान में देरी कम होती थी और विभागों के बीच तालमेल बेहतर माना जाता था, जिससे काम का दबाव होने के बावजूद व्यवस्थागत स्पष्टता बनी रहती थी। कुछ कर्मचारियों के अनुसार, “उस समय दबाव जरूर था, लेकिन कार्यप्रणाली तय थी, जिससे अनिश्चितता कम रहती थी।” हालांकि यह आकलन व्यक्तिगत अनुभवों और राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकता है, लेकिन मौजूदा अव्यवस्था और दबाव की स्थिति में यह तुलना अब एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बनती जा रही है।

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