सुशासन तिहार में 16 लाख का गबन! पथरिया जनपद में डिजिटल सिग्नेचर से भुगतान, अब पंचायत फंड से रिकवरी पर विवाद
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| प्रतीकात्मक फोटो |
मुंगेली। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के जनपद पंचायत पथरिया में सुशासन तिहार के नाम पर लगभग 16 लाख रुपये के गबन का मामला एक बार फिर चर्चा में है। यह मामला पिछले वर्ष सामने आया था, जब पंचायतों के नाम पर सामग्री खरीदी और व्यवस्थाओं के नाम पर लाखों रुपये के भुगतान किए जाने की जानकारी मिली।
मामले में जांच, कार्रवाई और बर्खास्तगी जैसे कदम उठाए गए, लेकिन अब एक नया विवाद सामने आया है। आरोप है कि जिस राशि का गबन हुआ था, उसकी भरपाई अब पंचायतों को मिलने वाली मुलभूत की राशि से की जा रही है, जिससे पूरे मामले ने फिर से तूल पकड़ लिया है।
यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायत व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
मामला कैसे सामने आया
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब सुशासन तिहार के दौरान पंचायतों के विकास कार्यों और व्यवस्थाओं के नाम पर किए गए खर्च की जानकारी सामने आई।
बताया गया कि जनपद पंचायत पथरिया के अंतर्गत आने वाली करीब 94 ग्राम पंचायतों के नाम पर कुछ व्यवस्थाओं और सामग्री खरीद के लिए राशि स्वीकृत की गई थी।
जांच और शिकायतों के बाद सामने आया कि पंचायतों के नाम पर लगभग 16 लाख 9 हजार 700 रुपये का भुगतान किया गया।
आरोप यह लगा कि यह भुगतान कुछ चुनिंदा फर्मों के खातों में ट्रांसफर किया गया, जबकि कई पंचायतों को इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने सवाल उठाया कि यदि पंचायतों के नाम पर भुगतान हुआ है तो सरपंच और सचिव को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई।
डिजिटल सिग्नेचर के दुरुपयोग का आरोप
मामले में सबसे गंभीर आरोप डिजिटल सिग्नेचर के दुरुपयोग का है।
बताया गया कि पंचायतों के नाम पर किए गए भुगतान के लिए डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग किया गया। आरोप यह है कि कुछ मामलों में पंचायत प्रतिनिधियों की जानकारी के बिना ही डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल कर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
इस मामले में यह भी सामने आया कि
👀 कई भुगतान के साथ सामग्री की डिलीवरी का प्रमाण नहीं मिला
👀 साइट निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी
👀 कई जगहों पर बिल और भुगतान रिकॉर्ड में भी अस्पष्टता थी
इन तथ्यों के सामने आने के बाद मामला धीरे-धीरे बड़ा विवाद बन गया।
शिकायतें और जांच
मामले को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने शिकायत की।
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पंचायतों के नाम पर राशि खर्च दिखाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।
इसके बाद प्रशासन ने इस मामले की जांच कराने का निर्णय लिया। जिला पंचायत स्तर पर जांच टीम गठित की गई और दस्तावेजों की पड़ताल शुरू हुई।
जांच में यह बात सामने आई कि कुछ मामलों में वित्तीय अनियमितता हुई है।
कर्मचारी पर कार्रवाई
जांच रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने इस मामले में कार्रवाई भी की।
मामले में कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल अमाध्या को जिम्मेदार मानते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इसके अलावा कुछ कर्मचारियों के तबादले भी किए गए। प्रशासन ने इसे कार्रवाई बताते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ उचित कदम उठाए गए हैं।
लेकिन शिकायतकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह कार्रवाई पर्याप्त नहीं है।
उनका आरोप है कि इतने बड़े वित्तीय मामले में केवल एक कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
बड़े अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठने लगा कि क्या इतनी बड़ी राशि का भुगतान केवल एक कर्मचारी के स्तर पर संभव है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि भुगतान की प्रक्रिया में कई स्तरों पर अनुमोदन और निगरानी होती है। ऐसे में यदि अनियमितता हुई है तो ऊपर के अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
इस मुद्दे को लेकर कई बार प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग भी की गई।
कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत
मामले को लेकर शिकायतकर्ताओं ने कलेक्टर जनदर्शन में भी आवेदन दिया।
शिकायत में मांग की गई कि -
👉 पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए
👉 भुगतान से जुड़े सभी बिल, जीएसटी रिकॉर्ड और बैंक स्टेटमेंट की जांच की जाए
👉 दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो तो पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सकती है।
एफआईआर और रिकवरी की चर्चा
जांच के बाद यह भी कहा गया कि मामले में एफआईआर दर्ज की जा सकती है और राशि की रिकवरी की जाएगी।
हालांकि काफी समय तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि गबन की राशि किससे और कैसे वसूली जाएगी।
इसी दौरान प्रशासन की कार्रवाई को लेकर कई तरह की चर्चाएं चलती रहीं।
अब सामने आई नई स्थिति
अब इस पूरे मामले में एक नया मोड़ सामने आया है।
ताजा जानकारी के अनुसार गबन की राशि की भरपाई पंचायतों को मिलने वाली 15वें वित्त आयोग की राशि से की जा रही है।
बताया जा रहा है कि पंचायतों के 15वें वित्त आयोग के फंड से लगभग 15 लाख रुपये की रिकवरी की प्रक्रिया शुरू की गई है।
यही बात अब विवाद का कारण बन गई है।
15वें वित्त आयोग की राशि क्या होती है
15वें वित्त आयोग की राशि केंद्र सरकार द्वारा पंचायतों को दी जाने वाली वह राशि है, जिसका उपयोग गांवों के मूलभूत विकास कार्यों के लिए किया जाता है।
इस राशि से सामान्यतः निम्न कार्य किए जाते हैं:
🔯 पेयजल व्यवस्था
🔯 नाली और जल निकासी
🔯 स्वच्छता और सफाई
🔯 स्ट्रीट लाइट
पंचायत भवन और अन्य आधारभूत सुविधाएं
यदि इसी राशि से गबन की भरपाई की जाती है तो गांवों के विकास कार्यों पर असर पड़ सकता है।
सरपंच और सचिव से भी वसूली
इस मामले में प्रशासन ने सरपंच और पंचायत सचिव को भी जिम्मेदार मानते हुए उनसे वसूली की प्रक्रिया शुरू की है।
हालांकि कई सरपंचों का कहना है कि यदि भुगतान जनपद स्तर से डिजिटल सिग्नेचर के माध्यम से किया गया, तो पंचायत प्रतिनिधियों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
उनका कहना है कि कई पंचायतों को तो इस भुगतान की जानकारी तक नहीं थी।
सरपंचों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का यह भी कहना है कि जिस फर्म या व्यक्तियों के खातों में यह राशि ट्रांसफर हुई है, सबसे पहले उनसे ही रिकवरी की जानी चाहिए, क्योंकि भुगतान का सीधा लाभ उन्हें मिला है।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी
गांवों के लोगों का कहना है कि पंचायतों के विकास के लिए आने वाली राशि से यदि गबन की भरपाई की जाती है तो इसका सीधा असर गांव के विकास पर पड़ेगा।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि शुरुआत में ही सख्त कार्रवाई की जाती तो मामला इतना बड़ा नहीं होता।
इस मामले में लागू हो सकते हैं ये कानून
यदि जांच में गबन और धोखाधड़ी साबित होती है तो दोषियों पर कई गंभीर धाराएं लग सकती हैं।
भारतीय दंड संहिता (IPC)
🌐धारा 409 – सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक विश्वासघात
🌐धारा 420 – धोखाधड़ी
🌐धारा 467 और 468 – जालसाजी
🌐धारा 471 – फर्जी दस्तावेज का उपयोग
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988
सरकारी पद का दुरुपयोग कर आर्थिक लाभ लेने पर कार्रवाई।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000
डिजिटल सिग्नेचर के दुरुपयोग के मामलों में भी कार्रवाई का प्रावधान है।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इतनी बड़ी राशि का भुगतान हुआ तो क्या इसकी निगरानी नहीं की गई।
इसके अलावा यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या सभी दोषियों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई की जाएगी या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल
सुशासन तिहार के नाम पर हुए लगभग 16 लाख रुपये के गबन के मामले में कई अहम सवाल अब भी खड़े हैं।
💰 पैसा आखिर किसके खाते में गया
🔍 सामग्री की सप्लाई किसने की
✅ डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल किसने किया
👂 रिकवरी पंचायतों से क्यों की जा रही है
📔 15वें वित्त आयोग की राशि से भरपाई क्या उचित है
इन सवालों के स्पष्ट जवाब अभी तक सामने नहीं आए है
मांग क्या है
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि
📕 जिन फर्मों या व्यक्तियों के खातों में राशि गई है, उनसे ही रिकवरी की जाए
📕पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए
📕भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच की जाए
📕दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए
निष्कर्ष
जनपद पंचायत पथरिया में सामने आया 16 लाख रुपये का गबन केवल एक वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि यह पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को भी उजागर करता है।
अब जब गबन की राशि की भरपाई पंचायतों के 15वें वित्त आयोग के फंड से किए जाने की बात सामने आई है, तो यह मामला और भी गंभीर हो गया है।
आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
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