फ्रोजन एम्ब्रियो विवाद पहुंचा Delhi High Court: पति-पत्नी के बीच 16 भ्रूणों के इस्तेमाल को लेकर कानूनी लड़ाई
मुंबई की एक 46 वर्षीय महिला से जुड़ा एक संवेदनशील और जटिल मामला अब अदालत तक पहुंच गया है। महिला ने अपने संरक्षित भ्रूणों यानी “फ्रोजन एम्ब्रियो” को लेकर Delhi High Court में याचिका दायर की है। इस याचिका में उसने अदालत से अनुमति मांगी है कि उसे इन भ्रूणों का उपयोग कर मां बनने का अधिकार दिया जाए।
बताया जा रहा है कि महिला अपने पति से अलग रह रही है और दोनों के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। हालांकि अभी तक दोनों का कानूनी तौर पर तलाक नहीं हुआ है। इसी बीच महिला ने अपने फ्रीज किए गए 16 भ्रूणों का इस्तेमाल कर मातृत्व प्राप्त करने की इच्छा जताई है, लेकिन उसके पति ने इस प्रक्रिया के लिए सहमति देने से इनकार कर दिया है। पति की असहमति के कारण यह मामला अब कानूनी विवाद का रूप ले चुका है।
मामला कैसे शुरू हुआ
जानकारी के अनुसार यह मामला वर्ष 2022 से जुड़ा हुआ है। मुंबई में रहने वाले इस दंपति ने शादी के कुछ समय बाद फर्टिलिटी उपचार की प्रक्रिया अपनाई थी। इसके तहत महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु से भ्रूण तैयार किए गए और उन्हें एक फर्टिलिटी क्लिनिक में सुरक्षित रूप से फ्रीज करवा दिया गया।
यह प्रक्रिया आम तौर पर उन दंपतियों द्वारा अपनाई जाती है जो भविष्य में परिवार बढ़ाने की योजना रखते हैं। इस तकनीक के माध्यम से भ्रूणों को संरक्षित कर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, ताकि बाद में आवश्यकता पड़ने पर उनका उपयोग किया जा सके।
लेकिन इस दंपति के साथ स्थिति अलग दिशा में चली गई। शादी के लगभग एक साल बाद ही दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए और उनके संबंधों में तनाव बढ़ता गया। अंततः दोनों अलग रहने लगे।
पति-पत्नी के बीच बढ़ा विवाद
दंपति के अलग होने के बाद महिला ने इन संरक्षित भ्रूणों के इस्तेमाल की इच्छा जताई। उसका कहना है कि वह अब भी मां बनना चाहती है और उसके पास जो भ्रूण संरक्षित हैं, उन्हीं के माध्यम से वह मातृत्व प्राप्त करना चाहती है।
लेकिन महिला के पति ने इस प्रक्रिया के लिए सहमति देने से इनकार कर दिया। इसी वजह से महिला को कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा।
मामला इसलिए भी जटिल हो गया क्योंकि भारत में सहायक प्रजनन तकनीक से जुड़े नियमों के अनुसार कई मामलों में पति-पत्नी दोनों की सहमति आवश्यक मानी जाती है।
पहले भी अदालत पहुंच चुकी है महिला
यह मामला पहली बार अदालत में नहीं पहुंचा है। इससे पहले महिला ने इस मुद्दे को लेकर Bombay High Court में भी याचिका दायर की थी।
हालांकि बाद में उसने सितंबर 2025 में अपनी याचिका वापस ले ली थी। बताया जाता है कि महिला ने यह कदम इसलिए उठाया था ताकि वह संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपनी अपील प्रस्तुत कर सके।
इसके बाद महिला ने राष्ट्रीय स्तर पर सहायक प्रजनन तकनीक से जुड़े बोर्ड के सामने अपनी अपील रखी।
बोर्ड ने भी खारिज की अपील
महिला ने अपनी अपील National Assisted Reproductive Technology and Surrogacy Board के सामने रखी थी।
लेकिन बोर्ड ने महिला की मांग को स्वीकार नहीं किया और उसकी अपील को खारिज कर दिया।
महिला का आरोप है कि उसकी अपील को ठीक से सुना ही नहीं गया और जल्दबाजी में खारिज कर दिया गया। इसी कारण उसने अब इस मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है।
महिला की अदालत से मांग
महिला ने अपनी याचिका में अदालत से अनुरोध किया है कि उसे अपने संरक्षित भ्रूणों को दूसरे फर्टिलिटी क्लिनिक में ट्रांसफर करने की अनुमति दी जाए।
उसका कहना है कि अगर यह अनुमति मिल जाती है तो वह भविष्य में इन भ्रूणों के जरिए मां बन सकती है।
महिला ने अदालत को बताया है कि उसने सहायक प्रजनन तकनीक कानून के तहत संबंधित धारा के अंतर्गत अनुमति मांगी थी। लेकिन पति की सहमति न मिलने के कारण उसकी मांग पर रोक लग गई।
कानून क्या कहता है
भारत में सहायक प्रजनन तकनीक (ART) से जुड़े मामलों के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं। इन नियमों के अनुसार कई प्रक्रियाओं के लिए पति-पत्नी दोनों की सहमति आवश्यक होती है।
यही वजह है कि इस मामले में पति की असहमति एक बड़ी कानूनी बाधा बन गई है।
महिला का कहना है कि उसके पति के साथ उसका संबंध अब लगभग समाप्त हो चुका है और इसी वजह से वह जानबूझकर सहमति नहीं दे रहा है।
महिला का दावा: मां बनने का अधिकार छीना जा रहा
महिला ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि उसके पति के व्यवहार के कारण उसका मां बनने का अधिकार छीन लिया गया है।
उसका कहना है कि वह लंबे समय से इस उम्मीद में थी कि एक दिन वह इन भ्रूणों के माध्यम से मां बन सकेगी।
लेकिन अब जब उसका पति सहमति देने से इनकार कर रहा है तो उसका सपना अधूरा रह सकता है।
महिला का यह भी आरोप है कि उसके पति ने उसे प्रताड़ित किया और बाद में उसे छोड़ दिया।
धार्मिक और कानूनी पहलू
इस मामले में एक और जटिल पहलू सामने आया है। कुछ धार्मिक कानूनों के अनुसार सहायक प्रजनन तकनीक का उपयोग केवल वैवाहिक संबंध के दायरे में ही स्वीकार्य माना जाता है।
यदि दंपति के बीच तलाक हो जाता है तो कई मामलों में इस तकनीक का उपयोग करना संभव नहीं होता।
इसी कारण यह मामला कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि संरक्षित भ्रूणों पर अंतिम अधिकार किसका होना चाहिए।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों की सहमति से भ्रूण तैयार किए गए थे, तो उनके उपयोग के लिए भी दोनों की सहमति जरूरी होनी चाहिए।
वहीं कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि महिला के प्रजनन अधिकार को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत का रुख क्या होगा
अब इस मामले पर अंतिम निर्णय Delhi High Court को करना है।
अदालत यह तय करेगी कि महिला को पति की सहमति के बिना अपने संरक्षित भ्रूणों का उपयोग करने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं।
यह फैसला न केवल इस दंपति के लिए बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
निष्कर्ष
मुंबई की इस महिला का मामला केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं रह गया है। यह मामला प्रजनन अधिकार, वैवाहिक सहमति और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों से जुड़े कई जटिल सवालों को सामने लाता है।
अब सभी की नजर अदालत के फैसले पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत महिला के मातृत्व के अधिकार और कानूनी नियमों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती है।
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