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पंचायतों में भ्रष्टाचार का जाल: पेयजल और स्वच्छता के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट, जमीनी हकीकत शून्य

 पंचायतों में पेयजल और स्वच्छता पर सवाल: कागजों में विकास,जमीन पर अव्यवस्था



प्रदीप मानिकपुरी/कोशलभूमि न्यूज 

मुंगेली/पथरिया-ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार द्वारा हर वर्ष पंचायतों को लाखों रुपये की राशि उपलब्ध कराई जाती है। पेयजल व्यवस्था, नाली सफाई, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक स्वच्छता जैसे कार्यों के लिए अलग-अलग मदों से फंड जारी किए जाते हैं। लेकिन कई पंचायतों में इन योजनाओं की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कागजों में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, जबकि जमीन पर समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि पेयजल व्यवस्था और साफ-सफाई के नाम पर हर दो महीने में लाखों रुपये खर्च दिखाए जा रहे हैं, जबकि वास्तविकता में इन कार्यों का कोई ठोस असर नजर नहीं आता। इससे न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका बढ़ती है, बल्कि ग्रामीणों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाएं भी प्रभावित होती हैं।

पंद्रहवें वित्त आयोग और मूलभूत निधि का उद्देश्य

पंचायतों को पंद्रहवें वित्त आयोग और मूलभूत निधि के तहत दी जाने वाली राशि का मुख्य उद्देश्य गांवों में आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करना है। इसमें पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता व्यवस्था, नालियों की सफाई, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण व रखरखाव शामिल है।

नियमों के अनुसार, इन फंड्स के उपयोग में पारदर्शिता अनिवार्य है। हर खर्च का रिकॉर्ड रखना, कार्यों की निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर सामाजिक अंकेक्षण कराना जरूरी होता है। इसके बावजूद कई जगहों पर इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है।

फर्जी बिल और कागजी कार्यों का खेल

ग्रामीणों के अनुसार, पंचायत के खाते में राशि आते ही फर्जी बिल बनाकर उसे निकाल लिया जाता है। बोर मरम्मत, मोटर सुधार, पाइपलाइन कार्य और सफाई के नाम पर बार-बार भुगतान दिखाया जाता है, जबकि धरातल पर कोई वास्तविक कार्य नहीं होता।

    गली मे लगा बोर    

कई मामलों में एक ही कार्य को बार-बार दिखाकर भुगतान लिया जाता है। सफाई कर्मचारियों को नियमित भुगतान दिखाया जाता है, लेकिन गांव में सफाई का कोई असर नजर नहीं आता। यह पूरा सिस्टम कागजों और फाइलों तक सीमित होकर रह गया है।

       पंचायत भवन के पीछे फैली गंदगी      

स्वच्छता व्यवस्था: फाइलों में साफ,जमीन पर गंदगी

स्वच्छता के लिए हर महीने बजट जारी होता है, लेकिन गांवों में गंदगी का आलम कुछ और ही कहानी कहता है। गलियों में कचरे के ढेर लगे रहते हैं, नालियां जाम रहती हैं और कचरा उठाव की कोई नियमित व्यवस्था नहीं है।

रिकॉर्ड में हर महीने साफ-सफाई का कार्य पूरा दिखाया जाता है, लेकिन वास्तविकता में यह केवल दस्तावेजों तक सीमित रहता है। इससे साफ जाहिर होता है कि स्वच्छता अभियान का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो रहा।

मुंगेली जिले के अमोरा पंचायत की जमीनी हकीकत

इस पूरे मामले को समझने के लिए मुंगेली जिले के जनपद पंचायत पथरिया अंतर्गत ग्राम पंचायत अमोरा का उदाहरण सामने आता है, जहां हालात बेहद चिंताजनक हैं।

      पंचायत भवन अमोरा      

पंचायत मुख्यालय में फैली गंदगी

जहां पंचायत मुख्यालय ही गंदगी की गोद में डूबा हुआ नजर आ रहा है, वहां स्वच्छता के दावों की सच्चाई साफ दिखाई देती है। पंचायत भवन के सामने बने शौचालय उपयोग के लायक नहीं हैं। उनमें न नियमित सफाई होती है और न रखरखाव व पानी की कोई व्यवस्था है, जिससे लोग उनका उपयोग करने से बचते हैं।

बगल में रखा सिंटेक्स टैंक भी केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, क्योंकि उसमें पानी के लिए कोई पाइप कनेक्शन नहीं है। भवन के पीछे का नजारा और भी खराब है, जहां चारों ओर गंदगी फैली हुई है और कचरे के ढेर लगे हुए हैं।

वार्ड और सार्वजनिक स्थानों की स्थिति

जब पंचायत मुख्यालय की हालत इतनी खराब हो, तो अन्य वार्डों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। वार्ड क्रमांक 01 की नालियां गंदगी से भरी हुई हैं और नियमित सफाई के अभाव में बजबजा रही हैं। इससे न केवल बदबू फैलती है, बल्कि बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

     वार्ड क्रमांक 09 मे नाली का पानी गली मे बह रहा    

बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थान के बीचोंबीच गंदा पानी बह रहा है, जिससे यात्रियों और स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। बाजार और हाट क्षेत्र, जहां रोजाना भीड़ रहती है, वहां भी चारों तरफ गंदगी फैली हुई है और कचरे के ढेर लगे हुए हैं।


कचरा प्रबंधन और स्वच्छता शेड की स्थिति

गांव में बनाए गए स्वच्छता शेड देखरेख के अभाव में जर्जर होते जा रहे हैं। वहां न तो कचरा संग्रहण हो रहा है और न ही उसका सही तरीके से निपटारा किया जा रहा है। यह स्थिति बताती है कि स्वच्छता के नाम पर किए जा रहे खर्च का सही उपयोग नहीं हो रहा।

सार्वजनिक शौचालयों की कमी

लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद गांव में एक भी व्यवस्थित सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध नहीं है। इससे लोगों को खुले में शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो स्वच्छता अभियान के उद्देश्यों के विपरीत है।

नियम और कानूनी प्रावधान

पंचायतों में कार्यों के संचालन और वित्तीय पारदर्शिता के लिए कई नियम बनाए गए हैं:

👀 पंचायत राज अधिनियम के तहत जवाबदेही सुनिश्चित करना

👀 वित्तीय नियमों के अनुसार बिना कार्य के भुगतान को अनियमितता माना जाता है

👀 सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) के माध्यम से कार्यों की जांच

👀 सूचना का अधिकार (RTI) के तहत नागरिकों को जानकारी प्राप्त करने का अधिकार

👀 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषियों पर कार्रवाई

इन सभी प्रावधानों के बावजूद यदि अनियमितताएं हो रही हैं, तो यह निगरानी तंत्र की कमजोरी को दर्शाता है।

जवाबदेही और सुधार की जरूरत

स्थिति को सुधारने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना बेहद जरूरी है। पंचायत स्तर पर खर्च का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए और नियमित निरीक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाने और सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी बनाने से भी इस समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर सख्त कार्रवाई आवश्यक है।

ये होनी चाहिए -

पंचायतों में पेयजल और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त राशि उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन यदि यह राशि सही तरीके से उपयोग नहीं हो रही, तो इसका सीधा नुकसान ग्रामीण जनता को उठाना पड़ता है।

कागजों में विकास दिखाने की बजाय वास्तविकता में सुधार लाना जरूरी है। जब तक पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी अनियमितताएं जारी रहेंगी। अब समय आ गया है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए और ग्रामीण विकास की योजनाओं को सही मायनों में जमीन पर उतारा जाए।


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