पंद्रहवें वित्त आयोग की राशि का खेल? पेयजल और स्वच्छता के नाम पर लाखों खर्च, लेकिन हालात बदतर
रिपोर्ट – कोशल भूमि / प्रदीप मानिकपुरी
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण विकास की तस्वीर कागजों में जितनी सुंदर दिखाई जाती है, जमीनी हकीकत उतनी ही चिंताजनक नजर आती है। शासन द्वारा ग्राम पंचायतों को पंद्रहवें वित्त आयोग (15th Finance Commission) सहित विभिन्न मदों के माध्यम से लाखों रुपए की राशि उपलब्ध कराई जाती है, ताकि गांवों में पेयजल, स्वच्छता और मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जा सकें।
लेकिन सवाल यह है कि जब कागजों में सब कुछ दुरुस्त है, तो गांवों में गंदगी और पानी की समस्या क्यों बनी हुई है?
इसी सवाल का जवाब खोजने जब हमारी टीम मुंगेली जिले के जनपद पंचायत पथरिया अंतर्गत ग्राम बरदुली पहुंची, तो जो तस्वीर सामने आई, वह चौंकाने वाली थी।
🚨 कागजों में विकास, जमीन पर बदहाली
ग्राम पंचायत बरदुली में पंचायत के दस्तावेजों के अनुसार नाली सफाई, स्वच्छता अभियान और पेयजल व्यवस्था के लिए नियमित रूप से राशि आहरित की गई है। सिंटेक्स टैंक लगाने के नाम पर भी खर्च दर्शाया गया है।
लेकिन जब वास्तविक स्थिति देखी गई, तो पंचायत भवन, आंगनबाड़ी और स्कूल परिसर में पहले से लगे सिंटेक्स टैंक ही खराब हालत में पाए गए। कई जगहों पर टैंक काम नहीं कर रहे हैं और पानी की आपूर्ति बाधित है।
अब सवाल यह उठता है कि जब पुराने सिंटेक्स ही चालू नहीं हैं, तो नए कार्यों के नाम पर राशि किस आधार पर निकाली गई?
💧 पेयजल व्यवस्था: सिर्फ कागजों में
गांव के कई मोहल्लों में लोगों से बातचीत करने पर सामने आया कि उन्हें नियमित पेयजल उपलब्ध नहीं हो रहा है। कई परिवारों को दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है।
जबकि पंचायत के रिकॉर्ड में पेयजल आपूर्ति के लिए लगातार खर्च दिखाया गया है।
यह स्थिति सीधे तौर पर यह संकेत देती है कि या तो कार्य अधूरे हैं, या फिर केवल कागजी खानापूर्ति कर राशि का आहरण किया गया है।
🧹 स्वच्छता अभियान की हकीकत: गंदगी का अंबार
स्वच्छता के नाम पर सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। “स्वच्छ भारत मिशन” जैसे अभियान भी लगातार चलाए जा रहे हैं।
लेकिन बरदुली गांव की गलियों में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आई।
👉 नालियां गंदगी से भरी हुई हैं
👉 कई जगहों पर कचरे का ढेर जमा है
👉 बदबू और मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है
गांव के लोगों का कहना है कि नालियों की सफाई शायद महीनों से नहीं हुई है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब सफाई के नाम पर राशि निकाली गई, तो सफाई आखिर हुई कहां?
🏚️ जिम्मेदार कौन? सरपंच या सचिव?
ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की जिम्मेदारी सरपंच और सचिव की होती है।
बरदुली में भी पंचायत द्वारा किए गए खर्चों की जवाबदेही इन्हीं पदाधिकारियों पर आती है।
लेकिन जमीनी स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि या तो कार्यों की निगरानी नहीं हो रही है, या फिर जानबूझकर लापरवाही बरती जा रही है।
अब बड़ा सवाल यह है कि:
👉 क्या यह सिर्फ लापरवाही है?
👉 या फिर इसमें भ्रष्टाचार की बू आ रही है?
📊 पंद्रहवें वित्त आयोग की राशि पर सवाल
पंद्रहवें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को विशेष रूप से पेयजल और स्वच्छता के लिए राशि दी जाती है।
इस राशि का उद्देश्य है:
हर घर तक स्वच्छ पेयजल
गांवों में साफ-सफाई
स्वास्थ्य और स्वच्छ वातावरण
लेकिन बरदुली जैसे उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि इन उद्देश्यों की पूर्ति किस हद तक हो रही है।
यदि राशि का उपयोग सही तरीके से किया गया होता, तो गांव में यह हालात नहीं होते।
⚖️ प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
यह पूरा मामला सिर्फ पंचायत तक सीमित नहीं है।
जनपद पंचायत और जिला प्रशासन की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे इन कार्यों की निगरानी करें।
👀 क्या कभी अधिकारियों ने मौके पर जाकर जांच की?
👀 क्या उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) की जांच सही तरीके से हुई?
👀क्या किसी भी स्तर पर जवाबदेही तय की गई?
यदि नहीं, तो यह लापरवाही सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र पर भी सवाल खड़े करती है।
ग्रामीणों की आवाज: “हमें सिर्फ आश्वासन मिलता है”
गांव के कई लोगों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि:
“हम लोग कई बार शिकायत कर चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। अधिकारी आते हैं, देखते हैं और चले जाते हैं।”
यह बयान ग्रामीण व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करता है, जहां जनता की आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है।
🔍 क्या होनी चाहिए जांच?
इस पूरे मामले में आवश्यक है कि:
✅ पंचायत के सभी खर्चों की जांच हो
✅ सिंटेक्स और पेयजल कार्यों का भौतिक सत्यापन किया जाए
✅ नाली सफाई और स्वच्छता कार्यों की वास्तविक स्थिति का आकलन हो
✅ दोषी पाए जाने पर सरपंच/सचिव पर कार्रवाई की जाए
⚠️ अगर अब भी नहीं जागे, तो…
यदि ऐसे मामलों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो शासन की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी।
गांवों का विकास सिर्फ फाइलों में दिखेगा, जमीन पर नहीं।
🔴 निष्कर्ष (Conclusion)
बरदुली गांव की स्थिति एक उदाहरण है, लेकिन यह समस्या सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं है।
राज्य के कई गांवों में इसी तरह की शिकायतें सामने आती रहती हैं, जहां विकास कार्यों के नाम पर राशि खर्च दिखाई जाती है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही होती है।
अब समय आ गया है कि शासन और प्रशासन दोनों इस दिशा में गंभीर कदम उठाएं, ताकि जनता का भरोसा बना रहे और योजनाओं का सही लाभ लोगों तक पहुंचे।
📢 अंतिम सवाल (Call-Out)
👉 क्या बरदुली में हुए खर्च की निष्पक्ष जांच होगी?
👉 क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
👉 या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?






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