छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गांवों में कोटवार पद को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोटवार का पद किसी परिवार की विरासत नहीं है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः नहीं मिल सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के पिता या दादा के कोटवार होने मात्र से उस परिवार को इस पद पर अधिकार नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोटवार की नियुक्ति पूरी तरह से प्रशासनिक नियमों के तहत की जाती है, जिसमें उम्मीदवार की योग्यता, उम्र, चरित्र और प्रशासनिक कार्यों को निभाने की क्षमता को ध्यान में रखा जाता है।
बेमेतरा जिले के गांव से जुड़ा मामला
यह मामला बेमेतरा जिले के नवागढ़ तहसील अंतर्गत ग्राम गनियारी का है। यहां के कोटवार खेलनदास पनिका का 6 नवंबर 2010 को निधन हो गया था। उनके निधन के बाद यह पद खाली हो गया था और प्रशासन ने नियमों के तहत नए कोटवार की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की।
इस पद के लिए मृत कोटवार के बेटे परदेशी राम और गांव के ही निवासी रामबिहारी साहू ने आवेदन किया था। प्रशासनिक जांच और पात्रता के मूल्यांकन के बाद अधिकारियों ने रामबिहारी साहू को इस पद के लिए अधिक उपयुक्त पाया और उनकी नियुक्ति कर दी।
पिता के पद के आधार पर नियुक्ति की मांग
मृत कोटवार के बेटे परदेशी राम ने इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि उनके पिता लंबे समय तक गांव के कोटवार रहे हैं, इसलिए नियुक्ति में उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।
हालांकि प्रशासन ने नियमों के अनुसार दूसरे उम्मीदवार को अधिक योग्य मानते हुए नियुक्ति कर दी थी, जिसे याचिकाकर्ता ने अदालत में चुनौती दी।
अदालत ने नियमों को माना सर्वोपरि
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व कोटवार के परिवार को नियुक्ति में प्राथमिकता देना अनिवार्य नियम नहीं है। यह केवल प्रशासनिक विवेक का विषय हो सकता है, लेकिन इसे अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी पदों पर नियुक्ति केवल रिश्तेदारी या वंश के आधार पर नहीं की जा सकती।
चरित्र और योग्यता भी महत्वपूर्ण
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता परदेशी राम के खिलाफ पहले शांति भंग करने के मामले दर्ज रहे हैं। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 1996 और 2013 में उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 107/116 के तहत कार्रवाई की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि कोटवार पद के लिए उम्मीदवार का चरित्र साफ होना आवश्यक है, इसलिए यह पहलू भी नियुक्ति में महत्वपूर्ण माना जाता है।
उम्र और शिक्षा को भी माना गया आधार
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता की उम्र 54 वर्ष है, जबकि कोटवार पद के लिए सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष है। इसके विपरीत चयनित उम्मीदवार रामबिहारी साहू की उम्र 34 वर्ष है, जिससे वे अधिक समय तक सेवा दे सकते हैं।
शिक्षा के स्तर में भी अंतर पाया गया। परदेशी राम केवल तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं, जबकि रामबिहारी साहू पांचवीं कक्षा तक शिक्षित हैं। अदालत ने माना कि बेहतर शिक्षा प्रशासनिक कार्यों के संचालन में सहायक होती है।
हाईकोर्ट ने प्रशासन के फैसले को सही ठहराया
सभी तथ्यों और नियमों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने प्रशासन द्वारा की गई नियुक्ति को सही ठहराया और याचिका को खारिज कर दिया।
इस फैसले के साथ अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारी पदों पर नियुक्ति में वंशवाद नहीं बल्कि योग्यता, नियम और पात्रता को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
अब यह साफ हो गया है कि गांव का कोटवार वही बनेगा जो निर्धारित नियमों और योग्यताओं पर खरा उतरेगा, न कि केवल इसलिए कि उसके परिवार में पहले कोई इस पद पर रहा हो।
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