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छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की जमीनी हकीकत: नल लगे लेकिन पानी नहीं, पंचायतों पर बढ़ा बोझ

हर घर जल का सपना या अधूरी व्यवस्था? जमीनी हकीकत ने खोली कई परतें


ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई जल जीवन मिशन को देश की सबसे बड़ी ग्रामीण पेयजल योजना माना जाता है। इस योजना की शुरुआत वर्ष 2019 में इस लक्ष्य के साथ की गई थी कि देश के हर ग्रामीण परिवार तक पाइपलाइन के माध्यम से नल कनेक्शन दिया जाएगा और उन्हें नियमित रूप से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा।

सरकार ने इसे ग्रामीण विकास और जनस्वास्थ्य से जुड़ी क्रांतिकारी योजना बताया था। बड़े पैमाने पर प्रचार किया गया कि अब ग्रामीणों को पानी के लिए दूर-दूर तक नहीं जाना पड़ेगा और हर घर में नल के माध्यम से पानी उपलब्ध होगा।

लेकिन समय के साथ-साथ इस योजना को लेकर जमीनी स्तर पर कई सवाल उठने लगे हैं। छत्तीसगढ़ सहित देश के कई राज्यों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद आज भी कई गांवों में नलों में पानी नहीं पहुंच रहा।

कई स्थानों पर पाइपलाइन बिछ गई, पानी टंकियां बन गईं, घर-घर नल कनेक्शन भी दे दिए गए, लेकिन पानी की नियमित आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी। इससे ग्रामीणों के बीच असंतोष बढ़ने लगा है और योजना की वास्तविक सफलता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की स्थिति

छत्तीसगढ़ जैसे ग्रामीण और आदिवासी बहुल राज्य के लिए यह योजना बेहद महत्वपूर्ण मानी गई थी। राज्य के कई क्षेत्रों में लोग वर्षों से हैंडपंप, कुओं और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर थे।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में लाखों घरों तक नल कनेक्शन देने का दावा किया गया है। हजारों गांवों में पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया है और पानी टंकियों का निर्माण कराया गया है।

राज्य सरकार के अनुसार:

👉 लाखों ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन दिया गया

👉 हजारों गांवों को हर घर जल की श्रेणी में शामिल किया गया

👉 पानी की गुणवत्ता जांच के लिए प्रयोगशालाएं स्थापित की गईं

सरकार का कहना है कि इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल व्यवस्था में बड़ा सुधार हुआ है।

लेकिन जब जमीनी स्तर पर स्थिति का आकलन किया जाता है तो कई स्थानों पर तस्वीर इससे अलग दिखाई देती है।

करोड़ों खर्च के बाद भी सूखे नल

ग्रामीण क्षेत्रों में जल जीवन मिशन के तहत बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कराए गए। गांव-गांव में पानी टंकियां बनाई गईं और गलियों को खोदकर पाइपलाइन बिछाई गई।

लेकिन कई गांवों में स्थिति यह है कि नल तो लगाए गए हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं आता।

ग्रामीणों का कहना है कि:

👉 पाइपलाइन बिछी लेकिन जल स्रोत से कनेक्शन नहीं हुआ

👉 मोटर और पंप की व्यवस्था नहीं की गई

👉 कई जगह टंकी बनी लेकिन पानी भरने की व्यवस्था नहीं है

कुछ गांवों में तो महीनों तक नलों में पानी नहीं आता। ऐसे में ग्रामीणों को फिर से हैंडपंप या पुराने जल स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि उन्हें पहले की तरह पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है तो योजना का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।

पंचायतों पर बढ़ा पेयजल का बोझ

इस पूरी स्थिति का एक और बड़ा पहलू सामने आया है जो योजना की सफलता पर सीधे सवाल खड़े करता है।

ग्रामीण पंचायतों को मिलने वाली पंद्रहवां वित्त आयोग अनुदान की बड़ी राशि आज भी पेयजल व्यवस्था पर खर्च की जा रही है।

पंचायतों को मिलने वाले इस अनुदान का उपयोग गांवों के विकास कार्यों के लिए किया जाना होता है। लेकिन कई पंचायतों में इस राशि का बड़ा हिस्सा पानी की व्यवस्था पर खर्च करना पड़ रहा है।

इस राशि से निम्न कार्य कराए जा रहे हैं:

👉हैंडपंप की मरम्मत

👉बोरवेल खुदवाना

👉मोटर पंप लगाना

👉टैंकर से पानी की सप्लाई करना

👉पाइपलाइन मरम्मत

कई पंचायतों में इन कार्यों पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि यदि जल जीवन मिशन के तहत घर-घर तक पानी पहुंच रहा है तो पंचायतों को अलग से पेयजल व्यवस्था पर खर्च क्यों करना पड़ रहा है।

सरकारी दावे और जमीनी हकीकत में अंतर

सरकारी रिकॉर्ड में जल जीवन मिशन को बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कई रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में घरों को नल कनेक्शन मिल चुका है।


लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई स्थानों पर नल तो लगाए गए हैं, लेकिन पानी की आपूर्ति नियमित नहीं है।

ग्रामीणों का कहना है कि कागजों में गांव को हर घर जल घोषित कर दिया गया, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे अलग है।

कई गांवों में लोग अब भी पानी के लिए हैंडपंप पर लाइन लगाते दिखाई देते हैं।

निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल

योजना के क्रियान्वयन के दौरान निर्माण की गुणवत्ता को लेकर भी कई शिकायतें सामने आई हैं।

सूत्रों के अनुसार:

👉कई स्थानों पर पाइपलाइन बहुत कम गहराई में डाली गई

👉पानी टंकियों का निर्माण मानकों के अनुसार नहीं हुआ

👉कुछ स्थानों पर पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो गई

ग्रामीणों का आरोप है कि जल्दबाजी में काम पूरा करने के कारण गुणवत्ता से समझौता किया गया।

निगरानी की कमी

स्थानीय स्तर पर अधिकारियों का कहना है कि योजना के प्रारंभिक चरण में बड़े पैमाने पर कार्य शुरू कर दिए गए थे।

लेकिन निर्माण कार्यों की निगरानी के लिए पर्याप्त अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध नहीं थे। इसके कारण कई ठेकेदारों ने अपने तरीके से निर्माण कार्य किया।

जब शिकायतें बढ़ने लगीं तो कई ठेकेदारों ने काम बंद करने की भी चेतावनी दी।

फंड की कमी भी बनी वजह

कुछ अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में कई परियोजनाओं के अधूरे रहने का कारण फंड की कमी भी है।

योजना के लिए जितनी राशि उपलब्ध थी वह अधिकांश परियोजनाओं में खर्च हो चुकी है। इसके कारण कई अधूरे कार्यों को पूरा कर पाना मुश्किल हो रहा है।

कई स्थानों पर पाइपलाइन बिछ गई लेकिन पानी सप्लाई शुरू करने के लिए आवश्यक उपकरण नहीं लगाए जा सके।

ग्रामीणों की उम्मीदें टूटीं

जब जल जीवन मिशन की शुरुआत हुई थी तब ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें घर पर ही पानी मिलेगा।

लेकिन कई गांवों में स्थिति यह है कि:

👎 नल लगे हैं लेकिन पानी नहीं आता

👎 पाइपलाइन बिछाने के बाद सड़कें खराब हो गईं

👎 पानी टंकी खाली पड़ी रहती है

ऐसे में लोगों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है।

सवाल जो जवाब मांगते हैं

अब इस पूरी स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठ रहे हैं:

👉यदि योजना सफल है तो पंचायतों को पेयजल पर लाखों रुपये खर्च क्यों करना पड़ रहा है?

👉यदि घर-घर नल कनेक्शन दिए जा चुके हैं तो नलों में पानी क्यों नहीं आ रहा?

👉निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं हो रही?

👉अधूरे कार्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी किसकी है?

क्या होना चाहिए आगे

विशेषज्ञों का मानना है कि जल जीवन मिशन को वास्तव में सफल बनाने के लिए कई कदम उठाने होंगे।

सबसे पहले अधूरे कार्यों को जल्द पूरा करना होगा। इसके साथ ही निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच करनी होगी और दोषी ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।

इसके अलावा पानी के स्थायी स्रोतों की व्यवस्था करना भी आवश्यक है।

                निष्कर्ष               

जल जीवन मिशन एक महत्वाकांक्षी योजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण भारत को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना है। छत्तीसगढ़ में इस योजना के तहत बड़े पैमाने पर काम हुआ है और हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।

लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं।

यदि इन समस्याओं को समय रहते दूर नहीं किया गया तो यह योजना भी कई अन्य योजनाओं की तरह केवल कागजी उपलब्धियों तक सीमित रह सकती है।

ग्रामीणों की उम्मीद केवल एक ही है

नल लगा है तो उसमें पानी भी आना चाहिए।

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