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जमीन बंटवारे में गड़बड़ी का आरोप, तहसीलदार के फैसले को चुनौती-पथरिया राजस्व का मामला
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जमीन बंटवारे में गड़बड़ी का आरोप, तहसीलदार के फैसले को चुनौती-पथरिया राजस्व का मामला

 मुंगेली जिले के पथरिया तहसील में फर्द बंटवारे के खिलाफ अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष अपील की तैयारी 

तहसील कार्यालय पथरिया 

पथरिया/मुंगेली // ये पूरा मामला संयुक्त जमीन के बंटवारे से जुड़ा है, जिसमें कई खसरा नंबर शामिल हैं। आवेदक का स्पष्ट कहना है कि सभी हिस्सेदारों को हर जमीन में उनके हिस्से के अनुसार भाग मिलना चाहिए था। लेकिन तहसीलदार द्वारा पारित आदेश में केवल कब्जे को आधार बनाकर जमीन का विभाजन कर दिया गया।

आदेश में यह माना गया कि सभी पक्षकार लंबे समय से अलग-अलग हिस्सों में काबिज हैं, इसलिए उसी आधार पर फर्द तैयार की गई। लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, बंटवारे का मूल सिद्धांत यह है कि हर हिस्सेदार को संपूर्ण संपत्ति में समान अनुपात में हिस्सा दिया जाए। यानी किसी को सिर्फ एक खसरा देकर अन्य जमीनों से वंचित करना सामान्यतः उचित नहीं माना जाता।

हालांकि, कानून यह भी कहता है कि अगर लंबे समय से स्पष्ट और प्रमाणित कब्जा हो, तो उस आधार पर भी बंटवारा किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कब्जा पूरी तरह सिद्ध हो—जैसे गवाह, दस्तावेज और राजस्व रिकॉर्ड।

सभी जमीनों में समान हिस्सेदारी की मांग को नजरअंदाज कर कब्जे के आधार पर किया गया बंटवारा

आवेदक का स्पष्ट कहना है कि सभी हिस्सेदारों को प्रत्येक जमीन के टुकड़े में उनके हिस्से के अनुसार बराबर हिस्सा दिया जाए, जिसके लिए उसने सपथ पत्र /सहमति भी प्रदान की थी। इसके बावजूद राजस्व प्राधिकारी द्वारा आवेदक के इस प्रस्ताव को नजरअंदाज करते हुए सीधे कथित कब्जे को आधार बनाकर फर्द बंटवारा कर दिया गया। आवेदक का आरोप है कि इस दौरान न तो उसके द्वारा दी गई सहमति पर विचार किया गया और न ही संपूर्ण संपत्ति में समान वितरण के सिद्धांत को लागू किया गया, जिससे बंटवारा प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।

आपत्ति खारिज कर असहमति के बावजूद एकतरफा बंटवारा,नियमों के उल्लंघन के आरोप

उक्त बंटवारे के संबंध में अनावेदक क्रमांक-2 द्वारा विधिवत आपत्ति प्रस्तुत की गई थी, किन्तु राजस्व प्राधिकारी द्वारा उस आपत्ति का समुचित एवं कारणयुक्त निराकरण करने के स्थान पर मात्र पूर्व तैयार फर्द बंटवारे को आधार मानते हुए उसे खारिज कर दिया गया। इसके पश्चात आवेदक एवं अनावेदक क्रमांक-2 की स्पष्ट असहमति के बावजूद केवल कथित कब्जे को आधार बनाकर फर्द बंटवारा कर दिया गया। जबकि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 178 के अंतर्गत बंटवारा करते समय सभी पक्षकारों की हिस्सेदारी, संपूर्ण संपत्ति में समान वितरण तथा साक्ष्यों का समुचित परीक्षण करना आवश्यक होता है। साथ ही, धारा 44 के तहत अपील का प्रावधान यह स्पष्ट करता है कि यदि आदेश में विधिक त्रुटि, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन या आपत्तियों का उचित निराकरण न किया गया हो, तो वह आदेश अपील योग्य होता है। वर्तमान प्रकरण में न केवल आपत्ति का विधिसम्मत निराकरण नहीं किया गया, बल्कि पक्षकारों की इच्छा के विरुद्ध एकतरफा रूप से कब्जे के आधार पर बंटवारा कर दिया गया, जो कि स्थापित विधिक सिद्धांतों एवं प्राकृतिक न्याय के विपरीत प्रतीत होता है।

विवादित आदेश में आवेदक का आरोप है कि:

✅मौखिक बंटवारे को बिना ठोस साक्ष्य के मान लिया गया। 

✅सभी जमीनों में समान हिस्सेदारी नहीं दी गई। 

✅आपत्तियों का उचित और कारणयुक्त निराकरण नहीं किया गया। 

✅ आवेदक के सपथ पत्र को नजरंदाज किया गया। 

अनुविभागिया कार्यालय पथरिया 

यही नहीं, आरोप यह भी है कि बंटवारे के दौरान संतुलन यानी equitable adjustment का ध्यान नहीं रखा गया, जिससे एक पक्ष को नुकसान हुआ।

इसी आधार पर अब अपील में यह प्रमुख तर्क रखा जाएगा कि आदेश न केवल विधि के विपरीत है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है। साथ ही, आदेश को मनमाना और एकतरफा बताया जा रहा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अपील के साथ-साथ आदेश के क्रियान्वयन पर रोक यानी स्टे की भी मांग की जाएगी, ताकि अंतिम निर्णय तक जमीन की स्थिति में कोई बदलाव न हो सके।

यह मामला अब केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा उदाहरण बन गया है कि राजस्व बंटवारे में कानून और व्यवहार (कब्जा) के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए

अब इस पूरे मामले में सभी की नजर SDM के फैसले पर टिकी हुई है। यदि अपील में आदेश निरस्त होता है, तो पूरे प्रकरण में नए सिरे से बंटवारा प्रक्रिया शुरू हो सकती है।


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