करोड़ों खर्च के बाद भी जनता प्यासी,ठेकेदार मालामाल,शासन की चुप्पी पर बड़ा सवाल
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| प्रतिकात्मक चित्र |
विशेष रिपोर्ट | प्रदीप मानिकपुरी
प्रदेश में हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की गई जल जीवन मिशन योजना अब अपने ही बोझ तले दबती नजर आ रही है। केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना को ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन बदलने वाली पहल के रूप में देखा गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद आज भी कई गांवों में लोग पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि कागजों में उनके घर तक नल कनेक्शन पहुंचाने का दावा किया जा चुका है।
🔴 प्रारंभ में भुगतान की रफ्तार तेज, लेकिन गुणवत्ता पर सवाल
योजना के शुरुआती चरण में संबंधित ठेकेदारों को तेजी से भुगतान किया गया। कई मामलों में बिना पूर्ण कार्य के ही किस्तों में राशि जारी कर दी गई। इसके बावजूद कार्यों की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रहीं। ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने बार-बार यह आरोप लगाया कि पाइपलाइन बिछाने में मानकों का पालन नहीं किया गया, टंकियों का निर्माण अधूरा है और कई स्थानों पर कार्य केवल दिखावे के लिए किया गया है।
हैरानी की बात यह है कि इन शिकायतों के बावजूद प्रशासन द्वारा कोई सख्त और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। न तो कार्यों की गुणवत्ता की गंभीर जांच की गई और न ही दोषी ठेकेदारों पर कोई बड़ी कार्रवाई देखने को मिली।
पेयजल व्यवस्था को लेकर मुंगेली जिले के विकासखण्ड पथरिया की स्थिति जननी चाही तो संबंधित अधिकारी ने साफ तौर पर कहा कि शासन ठेकेदारों को राशि नहीं दे पा रही है इसलिए ठेकेदार काम बंद कर दिए है। लेकिन पहले जो भुगतान हुए हैं उस पर काम कितना हुआ और स्थिति क्या है उस सवाल नहीं किया जा रहा......
🟠 अब ठेकेदारों का पलटवार—भुगतान नहीं मिलने का आरोप
स्थिति अब और भी जटिल हो गई है। जिन ठेकेदारों को पहले भुगतान किया गया, वे अब शेष राशि नहीं मिलने का आरोप प्रशासन पर लगा रहे हैं। उनका कहना है कि भुगतान लंबित होने के कारण वे कार्य को आगे बढ़ाने में असमर्थ हैं।
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| खड़ी पड़ी नल की tonti |
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ठेकेदारों ने अब तक जितनी राशि प्राप्त की है, उसके अनुरूप कार्य किया है?
जमीनी स्तर पर स्थिति देखने पर यह साफ प्रतीत होता है कि अधिकांश स्थानों पर कार्य प्राप्त भुगतान के अनुपात में नहीं हुआ है।
🟡 “आगे पाट, पीछे सपाट”—योजना की हकीकत
जल जीवन मिशन के कार्यों की स्थिति को यदि एक कहावत में समझा जाए तो “आगे पाट,पीछे सपाट” बिल्कुल सटीक बैठती है। कई गांवों में मुख्य सड़कों पर पाइपलाइन बिछाकर कार्य पूरा दिखा दिया गया है, लेकिन अंदरूनी गलियों में कोई काम नहीं हुआ।
कहीं पाइपलाइन बिछाकर उसे खुला छोड़ दिया गया है, जिससे दुर्घटना का खतरा बना रहता है। कई स्थानों पर पानी की टंकियां अधूरी अवस्था में खड़ी हैं, जिनका उपयोग अभी तक शुरू नहीं हो पाया है।
इससे साफ है कि योजना का क्रियान्वयन केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित होकर रह गया है, जबकि वास्तविक लाभ हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
🟢 ग्रामीणों की परेशानी—आज भी पानी के लिए जद्दोजहद
इस योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य था ग्रामीणों को घर-घर पानी उपलब्ध कराना, ताकि उन्हें दूर-दराज से पानी लाने की समस्या से मुक्ति मिल सके। लेकिन वर्तमान स्थिति में ग्रामीणों की परेशानी पहले जैसी ही बनी हुई है।
महिलाएं और बच्चे आज भी कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर हैं। नल लगे हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं आता। इससे लोगों में आक्रोश और निराशा दोनों बढ़ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि—
“सरकार ने वादा किया था हर घर जल का, लेकिन हकीकत में हमें आज भी पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।”
🔵 करोड़ों खर्च, लेकिन नतीजा शून्य
जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश में करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन यदि जमीनी स्तर पर परिणाम देखें, तो स्थिति निराशाजनक है। कई जगहों पर अधूरे कार्यों के बावजूद भुगतान किए जाने की बात सामने आ रही है।
इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि कहीं न कहीं वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है। यदि समय रहते इसकी जांच नहीं की गई, तो यह घोटाला और बड़ा रूप ले सकता है।
🟣 ठेकेदार मालामाल, जनता बेहाल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को हो रहा है। जहां एक ओर ग्रामीण पानी के लिए परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर ठेकेदारों को भारी भुगतान मिलने की खबरें सामने आ रही हैं।
अधूरे कार्यों के बावजूद भुगतान होना यह दर्शाता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं बड़ी खामी है। इससे यह भी सवाल उठता है कि क्या अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच मिलीभगत है?
⚫ प्रशासन की चुप्पी—सबसे बड़ा सवाल
पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू प्रशासन की चुप्पी है। लगातार शिकायतों और जमीनी सच्चाई सामने आने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
न तो किसी बड़े अधिकारी पर जिम्मेदारी तय की गई और न ही ठेकेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई देखने को मिली। इससे लोगों का भरोसा प्रशासन पर कम होता जा रहा है।
🔶 जवाबदेही तय करना जरूरी
जल जीवन मिशन जैसी महत्वपूर्ण योजना में इस तरह की लापरवाही और अनियमितता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है।
यदि समय रहते पारदर्शिता और निगरानी को मजबूत नहीं किया गया, तो यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह कागजों में ही सिमटकर रह जाएगी।
🔻 अब आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
क्या शासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएगा?
क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी समय के साथ दबा दिया जाएगा?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह कहना गलत नहीं होगा कि जल जीवन मिशन का लाभ आम जनता तक पहुंचने में अभी लंबा समय लग सकता है।
जल जीवन मिशन का उद्देश्य भले ही नेक हो, लेकिन उसके क्रियान्वयन में आई खामियों ने इसे सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद यदि लोगों को बुनियादी सुविधा नहीं मिल रही है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को भी दर्शाता है।
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