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4 साल की बेटी को छोड़ सपनों का पीछा: असम की पल्लवी पायेंग ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में जीता रजत पदक
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4 साल की बेटी को छोड़ सपनों का पीछा: असम की पल्लवी पायेंग ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में जीता रजत पदक

मां बनने के बाद भी नहीं रुकीं पल्लवी, संघर्ष और परिवार के सहयोग से रचा सफलता का इतिहास

मेडल के साथ पल्लवी 

रायपुर, 30 मार्च 2026। सपनों को सच करने के लिए कभी-कभी कठिन फैसले लेने पड़ते हैं, और असम की भारोत्तोलक पल्लवी पायेंग ने यह साबित कर दिखाया है। महज छह महीने की बेटी को घर पर छोड़कर दोबारा अपने खेल करियर पर ध्यान देने का फैसला करने वाली पल्लवी ने आज अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में पल्लवी पायेंग ने महिलाओं के 69 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प की कहानी है।

मां और खिलाड़ी के बीच कठिन चुनाव

जब पल्लवी की बेटी केवल छह महीने की थी, तब उनके सामने जीवन का सबसे कठिन फैसला था—क्या वह अपने खेल को छोड़ दें या फिर अपने सपनों को जिंदा रखते हुए बेटी से दूर रहकर ट्रेनिंग जारी रखें।

इस मुश्किल समय में उनके पति ने उनका हौसला बढ़ाया और उनके सपनों को नई उड़ान दी। वहीं, उनकी मां ने बेटी की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली, जिससे पल्लवी को अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिला।

कोविड और मातृत्व के बाद वापसी की चुनौती

असम की मिसिंग जनजाति से ताल्लुक रखने वाली पल्लवी ने 2018 में वेटलिफ्टिंग की शुरुआत की थी और राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी। लेकिन कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उनके खेल जीवन की रफ्तार थम गई।

इसी दौरान वह मां बनीं, लेकिन खेल में वापसी का उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। हालांकि, मां बनने के बाद दोबारा फिटनेस हासिल करना और प्रतिस्पर्धा में लौटना उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा।

संघर्ष के बाद मिली सफलता

वापसी का सफर आसान नहीं था। 2023 में राज्य चैंपियनशिप में वह छठे स्थान पर रहीं, जबकि 2024 में भी उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा। लेकिन पल्लवी ने हार नहीं मानी।

2025 में उनकी मेहनत रंग लाई, जब उन्होंने तेजपुर में रजत पदक और अस्मिता लीग में स्वर्ण पदक जीता। इस साल भी उन्होंने अस्मिता लीग में स्वर्ण पदक हासिल कर अपनी शानदार वापसी को और मजबूत किया।

परिवार बना सबसे बड़ी ताकत

पल्लवी की सफलता के पीछे उनके परिवार का अहम योगदान रहा। उनके पति, जो सीमा सुरक्षा बल में कार्यरत हैं, हमेशा उनके साथ खड़े रहे। वहीं, उनकी मां ने बेटी की पूरी जिम्मेदारी संभालकर पल्लवी को आगे बढ़ने का हौसला दिया।

पल्लवी खुद मानती हैं कि बिना परिवार के सहयोग के यह सफर संभव नहीं था।

रजत पदक बना आत्मविश्वास का आधार

रायपुर में जीता गया यह रजत पदक पल्लवी के लिए बेहद खास है। यह न केवल उनकी मेहनत का परिणाम है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी नई ऊंचाई देता है।

पल्लवी का कहना है कि यह पदक उनके करियर के लिए एक अहम पड़ाव है और इससे उन्हें विश्वास मिला है कि वह बड़े मंच पर भी शानदार प्रदर्शन कर सकती हैं।

संघर्ष, त्याग और सफलता की मिसाल

पल्लवी पायेंग की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि हर उस महिला के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर हौसला मजबूत हो और परिवार का साथ मिले, तो कोई भी मुश्किल रास्ता सफलता तक पहुंचने से रोक नहीं सकता।


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